Sunday, March 13, 2011

सूचना आयोगों द्वारा ब्यूरोक्रेसी को बचाने के चक्कर में अपीलों का बढता अम्बार?

सूचना आयोगों द्वारा ब्यूरोक्रेसी को बचाने
के चक्कर में अपीलों का बढता अम्बार?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश में राज्य सूचना आयोग ने एक तरह से अपने हाथ खड़े करते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘‘अब हम इन लोक सूचना अधिकारियों का कुछ नहीं कर सकते|’’ यह निराशापूर्ण हताशा उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना ने बनारस में सूचना अधिकार पर आधारित एक कार्यक्रम में व्यक्त की| उन्होंने कहा कि ‘‘उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में हरेक आयुक्त 30 से लेकर 100 अपील रोज़ाना सुनता है, लेकिन इसके बावजूद लम्बित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती ही चली जा रही है|’’ उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘‘राज्य में सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करने वाले 90 प्रतिशत लोगों को राज्य सूचना आयोग में अपील दायर करनी पड़ती है| जिससे आयोग का काम लगातार बढ़ता जा रहा है|’’

अकेल उत्तर प्रदेश के सूचना आयोग की यह स्थिति नहीं है, बल्कि देश के सभी राज्यों और केन्द्रीय सूचना आयोग में भी यही हालात हैं, जहॉं पर प्रतिदिन अपीलों का अम्बार लगातार बढता ही जा रहा है| लेकिन दु:खद बात यह है कि अपीलों के इस बढते अम्बार के लिये सूचना आयोगों के आयुक्त अपील करने वाले आवेदकों को जिम्मेदार ठहराकर, असल बात से मीडिया एवं लोगों को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं और अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त होते हुए दिखने का प्रयास कर रहे हैं, जो अन्यायपूर्ण और अवैधानिक होने के साथ-साथ अवास्तविक स्थिति है| सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है|

सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर इन लोक सूचना अधिकारियों एवं प्रथम अपील अधिकारियों का इतना साहस कैसे बढ गया कि वे उपलब्ध एवं वांछित सूचना को आवेदकों को उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं| जिसके कारण व्यथित होकर 90 प्रतिशत आवेदकों को सूचना आयोग के समक्ष अपील पेश करने को विवश होना पड़ रहा है| इन सबकी हिम्मत किसने बढ़ाई है? सूचना न देने वाले अधिकारियों और प्रथम अपील अधिकारियों की बदनीयत का पता लग जाने एवं जानबूझकर आवेदकों को उपलब्ध सूचना, उपलब्ध नहीं करवाने का अवैधानिक कृत्य प्रमाणित हो जाने के बाद भी उनके विरुद्ध सूचना आयोगों द्वारा जुर्माना न लगाना या नाम-मात्र का जुर्माना लगाना तथा जुर्माने की तत्काल वसूली को सुनिश्‍चित नहीं करना, क्या सूचना नहीं देने वाले अफसरों को, स्वयं सूचना आयोग द्वारा प्रोत्साहित करना नहीं है|

इसके अलावा अपील पेश करके और अपना किराया-भाड़ा खर्च करके सूचना आयोग के समक्ष उपस्थित होने वाले आवेदकों को स्वयं सूचना आयुक्तों द्वारा सार्वजनिक रूप से डांटना-डपटना क्या सूचना नहीं देने वाली ब्यूरोक्रसी को सूचना नहीं देने को प्रोत्साहित नहीं करता है? सूचना आयोग निर्धारित अधिकतम पच्चीस हजार रुपये के जुर्माने के स्थान पर मात्र दो से पॉंच हजार का जुर्माना अदा करने के आदेश करते हैं और जानबूझकर सूचना नहीं देना प्रमाणित होने के बाद भी सूचना अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही के बारे में सम्बद्ध विभाग को निर्देश नहीं देते हैं|

ऐसे हालात में अगर अपीलों का अम्बार बढ रहा है तो इसके लिये केवल और केवल सूचना आयोग ही जिम्मेदार हैं| उन्हें सूचना अधिकार कानून का उपयोग करने वाले लोगों पर जिम्मेदारी डालने के बजाय, स्वयं का आत्मालोचना करना होगा और अपनी वैधानिक जिम्मेदारी का कानून के अनुसार निर्वाह करना होगा| यदि सूचना उपलब्ध होने पर भी कोई अधिकारी निर्धारित तीस दिन की अवधि में सूचना नहीं देता है, तो उस पर अधिकतम आर्थिक दण्ड अधिरोपित करने के साथ-साथ ऐसे अफसरों के विरुद्ध तत्काल अनुशासनिक कार्यवाही करके दण्ड की सूचना प्राप्त कराने के लिये भी उनके विभाग को सूचना आयोग द्वारा निर्देशित करना होगा|

यदि सूचना आयोग अफसरशाही के प्रति इस प्रकार का रुख अपनाने लगें तो एक साल के अन्दर-अन्दर दूसरी अपीलों में 90 प्रतिशत कमी लायी जा सकती है| सच्चाई तो यह भी है कि यदि सूचना का अधिकार कानून के अनुसार सभी सूचनाओं को जनता के लिये सार्वजनिक कर दिया जावे तो सूचना चाहने वालों की संख्या में भी भारी कमी लायी जा सकती है|

Tuesday, February 22, 2011

अब राजस्थान को तोड़ने की साजिश!


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
राज्य के राजनेता तो यही चाहते हैं कि राज्य के लोग एक-दूसरे के विरुद्ध सड़कों पर उतरें, हिंसा भड़के और आपस में धमासान हो, ताकि उन्हें राज्य में राजस्थानी को मान्यता प्रदान करने का राजनैतिक अवसर मिल सके या राजस्थानी को अस्वीकार किये जाने पर पूर्वी एवं पश्‍चिमी राजस्थान के नाम पर राज्य के दो टुकड़े करने का अवसर मिल सके| इन हालातों में राज्य के धीर, गम्भीर, संवेदनशील और समझदार लोगों को राजनेताओं, अफसरशाही एवं कुछेक कथित सहित्यकारों की इस गहरी साजिश को नाकाम करना होगा| अन्यथा परिणाम भयावह होंगे और कम से कम राज्य के दो टुकड़े होना तय है! क्या हम राजस्थान के टुकड़े करने को तैयार हैं?
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इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि राजस्थानी बोली मधुर अर्थात् बेहद मीठी है, जिससे सुनना हर किसी को सुखद अनुभव देता है, लेकिन इस मीठी बोली में कही जाने वाली बात को पूरी तरह से समझे बिना इसके बोले और सुने जाने का कोई मतलब नहीं है| राज्य के आधे से अधिक उन जिलों में भी राजस्थानी बोली को सम्पूर्ण आदर और सम्मान तो प्रदान किया जाता है, जहॉं पर इसे समझा और बोला भी नहीं जा सकता है, लेकिन राजस्थानी को जबरन थौपे जाने के प्रति भयंकर आक्रोश भी व्याप्त है|

विद्यार्थी वर्ग पर राजस्थानी बोली को, राजस्थानी भाषा के नाम पर जबरन थौपे जाने को उत्तरी, पूर्व एवं दक्षिणी राजस्थान के लोग कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते| इसके उपरान्त भी देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में भाषा के नाम पर वर्षों से कुटिल राजनीति चलाई जा रही है, जिसे राज्य की भाषाई संस्कृति से पूरी तरह से नावाकाफि पूर्व मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में जमकर हवा दी थी| अब इसी राजस्थानी बोली की आग में समय-सयम पर कुछेक छुटभैया साहित्यकार एवं राजनेता घी डालते रहते हैं और राजस्थानी के नाम पर राज्य के दो टुकड़े करने पर आमादा हैं|

जबकि इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण और समझने वाली बात ये है कि जिस देश और राज्य में राष्ट्रीय स्तर पर बोली जाने वाली हिन्दी भाषा तक को दरकिनार करके अफसरशाही द्वारा हर क्षेत्र में लगातार अंग्रेजी को बढावा दिया जा रहा है, वहॉं पर कुछ लोगों द्वारा टुकड़ों-टुकड़ों में, भिन्न-भिन्न प्रकार से बोली जाने वाली कथित राजस्थानी बोली को, राजस्थानी भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के नाम पर तुलनात्मक रूप से शान्त राजस्थान के आम लोगों को राजनेताओं और कुछ कथित साहित्यकारों द्वारा सौद्देश्य भड़काने का काम किया जा रहा है| जिसके परिणाम निश्‍चित तौर पर दु:खद होने वाले हैं|

सोमवार 21 फरवरी (2011) को विश्व मातृभाषा दिवस पर राज्य के कुछ मुठ्ठीभर लोगों द्वारा राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के नाम पर जगह-जगह धरने देने का खूब नाटक किया गया| इस दौरान स्वनामधन्य कथित महान साहित्यकारों, रचनाकारों के साथ साथ जोशीले युवाओं को भी मीडिया के माध्यम से सामने लाया गया| धरने में कथित रूप से मानव श्रृंखला बनाकर राजस्थानी को लुप्त होने से बचाने का संदेश भी दिया| राज्य के बड़े समाचार-पत्रों पर काबिज पश्‍चिमी राजस्थान के पत्रकारों ने इस खबर को बढाचढाकर प्रकाशित भी किया और यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया, मानो राजस्थानी बोली को राजस्थानी भाषा के रूप में मान्यता नहीं दी गयी तो जैसे राजस्थान का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा|

यहॉं पर सबसे महत्वपूर्ण और समझने वाली बात ये है कि सभी दलों के राजनेता तो ये चाहते हैं कि राजस्थान के दो टुकड़े होने पर दो मुख्यमन्त्री, दो-राज्यपाल और अनेक मन्त्रियों के पदों में वृद्धि होगी| अफसरशाही भी चाहती है कि राज्य के टुकड़े होने से ढेरों सचिवों के पदों में वृद्धि होगी| मीडिया भी चाहता है कि दो राज्य बनने से दौहरे विज्ञापन मिलेंगे और दौहरी राजनीति एवं दौहरे भ्रष्टाचार की गंगा बहेगी जिसमें जमकर नहाने का अवसर मिलेगा|

इसलिये इनकी ओर से बिना सोचे-समझे राजस्थानी बोली को राजस्थानी भाषा के रूप में राज्य पर थोपे जाने की वकालत की जा रही है| यदि इस मूर्खतापूर्ण प्रयास के विरुद्ध उत्तरी, पूर्वी एवं दक्षिणी राजस्थान के लोगों में विरोधस्वरूप आन्दोलन खड़ा हो गया तो राज्य के सौहार्दपूर्ण माहौल में आग लगना तय है|

राज्य के राजनेता तो यही चाहते हैं कि राज्य के लोग एक-दूसरे के विरुद्ध सड़कों पर उतरें, हिंसा भड़के और आपस में धमासान हो, ताकि उन्हें राज्य में राजस्थानी को मान्यता प्रदान करने का राजनैतिक अवसर मिल सके या राजस्थानी को अस्वीकार किये जाने पर पूर्वी एवं पश्‍चिमी राजस्थान के नाम पर राज्य के दो टुकड़े करने का अवसर मिल सके| इन हालातों में राज्य के धीर, गम्भीर, संवेदनशील और समझदार लोगों को राजनेताओं, अफसरशाही एवं कुछेक कथित सहित्यकारों की इस गहरी साजिश को नाकाम करना होगा| अन्यथा परिणाम भयावह होंगे और कम से कम राज्य के दो टुकड़े होना तय है! क्या हम राजस्थान के टुकड़े करने को तैयार हैं?

एक अंग्रेज की ईमानदार स्वीकारोक्ति!

एक अंग्रेज की ईमानदार स्वीकारोक्ति!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
"इंग्लेंड के लार्ड एंथनी लेस्टर ने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अवसर प्रदान किया है कि वे देश के नकाबपोश कर्णधारों से सीधे सवाल करें कि भारतीय दण्ड संहिता में वे प्रावधान अभी भी क्यों हैं, जिनका भारतीय जनता एवं यहॉं की संस्कृति से कोई मेल नहीं है?"

जहॉं तक मुझे याद है, मैं 1977 से एक बात को बड़े-बड़े नेताओं से सुनता आ रहा हूँ कि भारतीय कानूनों में अंग्रेजी की मानसिकता छुपी हुई है, इसलिये इनमें आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन परिवर्तन कोई नहीं करता है| हर नेता ने कानूनों में बदलाव नहीं करने के लिये सबसे लम्बे समय तक सत्ता में रही कॉंग्रेस को भी खूब कोसा है| चौधरी चरण सिंह से लेकर मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, चन्द्र शेखर, विश्‍वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह, लालू यादव, रामविलास पासवान और मायावती तक सभी दलों के राजनेता सत्ताधारी पार्टी या अपने प्रतिद्वन्दी राजनेताओं को सत्ता से बेदखल करने या खुद सत्ता प्राप्त करने के लिये आम चुनावों के दौरान भारतीय कानूनों को केवल बदलने ही नहीं, बल्कि उनमें आमूलचूल परिवर्तन करने की बातें करते रहे हैं|

परन्तु अत्यन्त दु:ख की बात है कि इनमें से जो-जो भी, जब-जब भी सत्ता में आये, सत्ता में आने के बाद वे भूल ही गये कि उन्होंने भारत के कानूनों को बदलने की बात भी जनता से कही थी|

अब आजादी के छ: दशक बाद एक अंग्रेज ईमानदारी दिखाता है और भारत में आकर भारतीय मीडिया के मार्फत भारतीयों से कहता है कि भारतीय दण्ड संहिता में अनेक प्रावधान अंग्रेजों ने अपने तत्कालीन स्वार्थसाधन के लिये बनाये थे, लेकिन वे आज भी ज्यों की त्यों भारतीय दण्ड संहिता में विद्यमान हैं| जिन्हें देखकर आश्‍चर्य होता है|

इंग्लेंड के लार्ड एंथनी लेस्टर ने कॉमनवेल्थ लॉ कांफ्रेंस के अवसर पर स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय दण्ड संहिता के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये पर्याप्त और उचित संरक्षक प्रावधान नहीं हैं| केवल इतना ही नहीं, बल्कि लार्ड एंथनी लेस्टर ने यह भी साफ शब्दों में स्वीकार किया कि भारतीय दण्ड संहिता में अनेक प्रावधान चर्च के प्रभाव वाले इंग्लैंड के तत्कालीन मध्यकालीन कानूनों पर भी आधारित है, जो बहु आयामी संस्कृति वाले भारतीय समाज की जरूरतों से कतई भी मेल नहीं खाते हैं| फिर भी भारत में लागू हैं|

भारतीय प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया अनेक बेसिपैर की बातों पर तो खूब हो-हल्ला मचाता है, लेकिन इंगलैण्ड के लार्ड एंथनी लेस्टर की उक्त महत्वूपर्ण स्वीकारोक्ति एवं भारतीय दण्ड संहिता की विसंगतियों के बारे में खुलकर बात कहने को कोई महत्व नहीं दिया जाना किस बात का संकेत है?

इससे हमें यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि मीडिया भी भारतीय राजनीति और राजनेताओं की अवसरवादी सोच से प्रभावित है| जो चुनावों के बाद अपनी बातों को पूरी तरह से भूल जाता है| लगता है कि मीडिया भी जन सरोकारों से पूरी तरह से दूर हो चुका है|

इंग्लेंड के लार्ड एंथनी लेस्टर ने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अवसर प्रदान किया है कि वे देश के नकाबपोश कर्णधारों से सीधे सवाल करें कि भारतीय दण्ड संहिता में वे प्रावधान अभी भी क्यों हैं, जिनका भारतीय जनता एवं यहॉं की संस्कृति से कोई मेल नहीं है?

पी.के. रथ को सजा के बदले संरक्षण!

पी.के. रथ को सजा के बदले संरक्षण!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
सवाल ये नहीं है कि अपराधी कितने बड़े पद पर पदासीन है, बल्कि सवाल ये होना चाहिये कि किस लोक सेवक का क्या कर्त्तव्य था और उसने क्या अपराध किया है। यदि कोई लोक सेवक उच्च पद पर पदासीन है और फिर भी वह भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध तो कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिये।ऐसे अपराधी के प्रति और वो भी सेना के इतने उच्च पद पर पदस्थ अफसर के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरते जाने का तात्पर्य राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं है। इसके उपरान्त भी मात्र सेवा में दो वर्ष की वरिष्ठता कम कर देने की सजा को कठोर सजा बतलाना आम लोगों और पाठकों को मूर्ख बनाने के सिवा कुछ भी नहीं है।
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पिछले दिनों प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने एक खबर खूब बढाचढाकर प्रकाशित एवं प्रसारित किया गया कि सुकना भूमि घोटाले में सैन्य कोर्ट मार्शल ने थल सेना के पूर्व उप प्रमुख मनोनीत लेफ्टिनेंट जनरल पी. के. रथ को दोषी करार देकर कठोर दण्ड से दण्डित किया है। जबकि सच्चाई यह है कि पी. के. रथ के प्रति कोर्ट मार्शल की कार्यवाही में अत्यधिक नरम रुख अपनाया गया है। जब एक बार सेना का इतना बड़ा अधिकारी भ्रष्ट आचरण के लिये दोषी ठहराया जा चुका है, तो सर्व प्रथम तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों के अनुसार ऐसे भ्रष्ट अपराधी को कम से कम सेवा से बर्खास्त किये जाने का दण्ढ विभाग की ओर से दिया जाना चाहिये था और भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये जाने के कारण उसे जेल की हवा खिलाई जानी चाहिये थी। इसके उपरान्त भी मीडिया बार-बार लिख रहा है कि सेना के इतने बड़े अफसर को इतनी बड़ी सजा से दण्डित करके कोर्ट मार्शल के तहत ऐतिहासिक निर्णय सुनाया गया है। मीडिया का इस प्रकार का रुख भी भ्रष्टाचार को बढावा दे रहा है। जो सजा नहीं, बल्कि संरक्षण देने के समान है।

सवाल ये नहीं है कि अपराधी कितने बड़े पद पर पदासीन है, बल्कि सवाल ये होना चाहिये कि किस लोक सेवक का क्या कर्त्तव्य था और उसने क्या अपराध किया है। यदि कोई लोक सेवक उच्च पद पर पदासीन है और फिर भी वह भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध तो कठोरतम सजा का प्रावधान होना चाहिये।

33 कोर के पूर्व कमांडर को पश्चिम बंगाल के सुकना सैन्य केंद्र से लगे भूखंड पर एक शिक्षण संस्थान बनाने के लिए निजी रियल इस्टेट व्यापारी को ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ जारी कर दिया और इसकी सूचना अपने उच्च अधिकारियों तक को नहीं दी। सीधी और साफ बात है कि कई करोड़ की कीमत की जमीन पर निजी शिक्षण संस्थान (जो इन दिनों शिक्षा के बजाया व्यापार के केन्द्र बन चुके हैं) के उपयोग हेतु जारी किया गया ‘‘अनापत्ति प्रमाण-पत्र’’ देश सेवा के उद्देश्य से तो जारी नहीं किया गया होगा। निश्चय ही इसके एवज में भारी भरकम राशी का रथ को गैर-कानूनी तरीके से भुगतान किया गया होगा।

ऐसे अपराधी के प्रति और वो भी सेना के इतने उच्च पद पर पदस्थ अफसर के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरते जाने का तात्पर्य राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं है। इसके उपरान्त भी मात्र सेवा में दो वर्ष की वरिष्ठता कम कर देने की सजा को कठोर सजा बतलाना आम लोगों और पाठकों को मूर्ख बनाने के सिवा कुछ भी नहीं है।

अत: बहुत जरूरी है कि कानून के राज एवं इंसाफ में विश्वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को देश के राष्ट्रपति, प्रधाममन्त्री, विधिमन्त्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग करके अपराधी रथ को सेना से बर्खास्त किये जाने एवं कारावास की सजा दिये जाने की मांग करनी चाहिये।

Sunday, December 5, 2010

"आपने पुलिस के लिये क्या किया है?"

"आपने पुलिस के लिये क्या किया है?"
पुलिस की वर्दी में भी हम जैसे ही इंसान होते हैं, आप उनको सच्ची बात बतायें, उनमें रुचि लें और उनको अपने बीच का इंसान समझें। उन्हें स्नेह और सम्मान दें, फिर आप देखें कि आपके साथ कैसा बर्ताव किया जाता है।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मैं जहाँ कहीं भी लोगों के बीच जाता हूँ और भ्रष्टाचार, अत्याचार या किसी भी प्रकार की नाइंसाफी की बात करता हूँ, तो सबसे पहले सभी का एक ही सवाल होता है कि हमारे देश की पुलिस तो किसी की सुनती ही नहीं। पुलिस इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि अब तो पुलिस से किसी प्रकार के न्याय की या संरक्षण की आशा करना ही बेकार है। और भी बहुत सारी बातें कही जाती हैं।

मैं यह नहीं कहता कि लोगों की शिकायतें गलत हैं या गैर-बाजिब हैं! मेरा यह भी कहना नहीं है कि पुलिस भ्रष्ट नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि हम में से जो लोग इस प्रकार की बातें करते हैं, वे कितने ईमानदार हैं? उनमें से ऐसे कितने हैं, जिन्होने कभी जून के महिने में चौराहे पर खडे यातायात हवलदार या सिवाही से पूछा हो कि भाई तबियत तो ठीक है ना, पानी पिया है या नहीं?

हम से कितने हैं, जिन्होंने कभी थाने में जाकर थाना प्रभारी को कहा हो कि मैं आप लोगों की क्या मदद कर सकता हूँ? आप कहेंगे कि पुलिस को हमारी मदद की क्या जरूरत है? पुलिसवाला भी एक इंसान ही है। जब हम समाज में जबरदस्त हुडदंग मचाते हैं, तो पुलिसवालों की लगातर कई-कई दिन की ड्यूटियाँ लगती हैं, उन्हें नहाने और कपडे बदलने तक की फुर्सत नहीं मिलती है। ऐसे में उनके परिवार के लोगों की जरूरतें कैसे पूरी हो रही होती हैं, कभी हम इस बात पर विचार करते हैं? ऐसे समय में हमारा यह दायित्व नहीं बनता है कि हम उनके परिवार को भी संभालें? उनके बच्चे को, अपने बच्चे के साथ-साथ स्कूल तक ले जाने और वापस घर तक छोडने की जिम्मेदारी निभाकर देखें?

यात्रा करते समय गर्मी के मौसम में चौराहे पर खडे पुलिसवाले को अपने पास उपलब्ध ठण्डे पानी में से गाडी रोककर पानी पिलाकर देखें? पुलिसवालों के आसपास जाकर पूछें कि उन्हें अपने गाँव, अपने माता-पिता के पास गये कितना समय हो गया है? पुलिस वालों से पूछें कि दंगों में या आतंक/नक्सल घटनाओं में लोगों की जान बचाते वक्त मारे गये पुलिसवालों के बच्चों के जीवन के लिये हम क्या कर सकते हैं? केवल पुलिस को हिकारत से देखने भर से कुछ नहीं हो सकता? हमेशा ही नकारत्मक सोच रखना ही दूसरों को नकारात्मक बनाता है।

हम तो किसी कानून का या नियम का या व्यवस्था का पालन नहीं करें और चाहें कि देश की पुलिस सारे कानूनों का पालन करे, लेकिन यदि हम कानून का उल्लंघन करते हुए भी पकडे जायें तो पुलिस हमें कुछ नहीं कहे? यह दौहरा चरित्र है, हमारा अपने आपके बारे में और अपने देश की पुलिस के बारे में।

कई वर्ष पहले की बात है, मुझे सूचना मिली कि मेरे एक परिचित का एक्सीडेण्ट हो गया है। मैं तेजी से गाडी चलाता हुआ जा रहा था, मुझे इतना तनाव हो गया था कि मैं सिग्नल भी नहीं देख पाया और लाल बत्ती में ही घुस गया। स्वाभाविक रूप से पुलिस वाले ने रोका, तब जाकर मेरी तन्द्रा टूटी।

मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैंने पुलिसवाले के एक शब्द भी बोलने से पहले पर्स निकाला और कहा भाई जल्दी से बताओ कितने रुपये देने होंगे। पुलिसवाला आश्चर्यचकित होकर मुझे देखने लगा और बोला आप कौन हैं? मैंने अपना लाईसेंस दिखाया। उसने जानना चाहा कि "आप इतनी आसानी से जुर्माना क्यों भर रहे हैं।" मैंने कहा गलती की है तो जुर्माना तो भरना ही होगा।

अन्त में सारी बात जानने के बाद उन्होनें मुझसे जुर्माना तो लिया ही नहीं, साथ ही साथ कहा कि आप तनाव में हैं। अपनी गाडी यहीं रख दें और उन्होनें मेरे साथ अपने एक जवान को पुलिस की गाडी लेकर मेरे साथ अस्पताल तक भेजा। ताकि रास्ते में मेरे साथ कोई दुर्घटना नहीं हो जाये?

हमेशा याद रखें कि पुलिस की वर्दी में भी हम जैसे ही इंसान होते हैं, आप उनको सच्ची बात बतायें, उनमें रुचि लें और उनको अपने बीच का इंसान समझें। उन्हें स्नेह और सम्मान दें, फिर आप देखें कि आपके साथ कैसा बर्ताव किया जाता है। आगे से जब भी कोई पुलिस के बारे में नकारात्मक टिप्पणी करे तो आप उससे सीधा सवाल करें कि-"आपने पुलिस के लिये क्या किया है?"

Thursday, December 2, 2010

संगठित जनता की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी!

संगठित जनता की एकजुट ताकत
के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी!

"या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें।"

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।

अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।

अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?

यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना त्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।

यह कैसा न्याय? अपराध सिद्ध फिर भी सजा नहीं!

यह कैसा न्याय?
अपराध सिद्ध फिर भी सजा नहीं!
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इस बात को कोई साधारण पढालिखा या साधारण सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी समझता है कि देश के खजाने को नुकसान पहुँचाने वाला व्यक्ति देशद्रोही से कम अपराधी नहीं हो सकता और उसके विरुद्ध कानून में किसी भी प्रकार के रहम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिये, लेकिन जिन्दगीभर भ्रष्टाचार के जरिये करोडों का धन अर्जित करने वालों को सेवानिवृत्ति के बाद यदि 1/2 पेंशन रोक कर सजा देना ही न्याय है तो फिर इसे तो कोई भी सरकारी अफसर खुशी-खुशी स्वीकार कर लेगा।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट ने एक निर्णय सुनाया, जिसमें न्यायाधीश द्वय प्रदीप नंदराजोग तथा एमसी गर्ग की खण्डपीठ ने रक्षा मंत्रालय से वरिष्ठ लेखा अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हो चुके एचएल गुलाटी की आधी पेंशन काटे जाने की बात कही गयी। गुलाटी भारत सरकार की सेवा करतु हुए 36 झूठे दावों के लिए भुगतान को मंजूरी देकर सरकारी खजाने को 42 लाख रुपये से भी अधिक की चपत लगायी थी। हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार का अपराध सिद्ध होने पर भी गुलाटी को जेल में डालने पर विचार तक नहीं किया और रक्षा मंत्रालय में रहकर भ्रष्ट आचरण करने वाले एचएल गुलाटी की 50 फीसदी पेंशन काटी जाने की सजा सुना दी।

हाई कोर्ट के इस निर्णय से भ्रष्टाचार को बढावा ही मिलेगा :

इस निर्णय को अनेक तथाकथित राष्ट्रीय कहलाने वाले समाचार-पत्रों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने अफसरों के लिये कोर्ट का कडा सन्देश कहकर प्रचारित किया। जबकि मेरा मानना है कि एक सिद्धदोष भ्रष्ट अपराधी के विरुद्ध हाई कोर्ट का इससे नरम रुख और क्या हो सकता था? मैं तो यहाँ तक कहना चाहूँगा कि हाई कोर्ट के इस निर्णय से भ्रष्टाचार पर लगाम लगने के बजाय भ्रष्टाचार को बढावा ही मिलेगा।

अनुशासनिक कार्यवाही के साथ-साथ दण्ड विधियों के तहत भी कार्यवाही :

प्रश्न यह नहीं है कि कोर्ट का रुख नरम है या कडा, बल्कि सबसे बडा सवाल तो यह है कि 42 लाख रुपये का गलत भुगतान करवाने वाले भ्रष्टाचारी के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता के तहत मामला दर्ज करके दण्डात्मक कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? और केवल विभागीय जाँच करके और विभागीय नियमों के तहत की जाने वाली अनुशासनिक कार्यवाही की औपचरिकता पूर्ण करके मामले की फायल बन्द क्यों कर दी गयी? जबकि विभागीय कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि लोक सेवकों द्वारा किये जाने वाले अपराधों के लिये अनुशासनिक कार्यवाही के साथ-साथ दण्ड विधियों के तहत भी कार्यवाही की जा सकती है या की जानी चाहिये।

कार्यवाही की जा सकती है या की जानी चाहिये शब्दावली भी समस्या की असल जड और 99 फीसदी समस्याओं के मूल कारण आईएएस :
इन कानूनों में-कार्यवाही की जा सकती है या की जानी चाहिये शब्दावली भी समस्या की असल जड है! इसके स्थान परविभागीय अनुशासनिक कार्यवाही के साथ-साथ दण्ड विधियों के तहत भी कार्यवाही की जायेगी और ऐसा नहीं करने पर जिम्मेदार उच्च लोक सेवक या विभागाध्यक्ष के विरुद्ध भी कार्यवाही होगी। ऐसा कानूनी प्रावधान क्यों नहीं है? जवाब भी बहुत साफ है, क्योंकि कानून बनाने वाले वही लोग हैं, जिनको ऐसा प्रावधान लागू करना होता है। ऐसे में कौन अपने गले में फांसी का फन्दा बनाकर डालना चाहेगा? कहने को तो भारत में लोकतन्त्र है और जनता द्वारा निर्वाचित सांसद, संसद मिलबैठकर कानून बनाते हैं, लेकिन- संसद के समक्ष पेश किये जाने वाले कानूनों की संरचना भारतीय प्रशासनिक सेवा के उत्पाद महामानवों द्वारा की जाती हैं। जो स्वयं ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस देश की 99 फीसदी समस्याओं के मूल कारण हैं।

जनता को कारावास और जनता के नौकरों की मात्र निंदा :
विचारणीय विषय है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गाली-गलोंच और मारपीट करता है तो आरोपी के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता के तहत अपराध बनाता है और ऐसे आरोपी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज होने पर पुलिस जाँच करती है। मजिस्ट्रेट के समक्ष खुली अदालत में मामले का विचारण होता है और अपराध सिद्ध होने पर कारावास की सजा होती है, जबकि इसक विपरीत एक अधिकारी द्वारा अपने कार्यालय के किसी सहकर्मी के विरुद्ध यदि यही अपराध किया जाता है तो उच्च पदस्थ अधिकारी या विभागाध्यक्ष ऐसे आरोपी के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज नहीं करवाकर स्वयं ही अपने विभाग के अनुशासनिक नियमों के तहत कार्यवाही करते हैं। जिसके तहत आमतौर पर चेतावनी, उसके कृत्य की भर्त्सना (निंदा) किये जाने आदि का दण्ड दिया जाता है और मामले को दफा-दफा कर दिया जाता है।

विभागाध्यक्ष भी तो अपराध कारित करते रहते हैं :
इस प्रकार के प्रकरणों में प्रताड़ित या व्यथित व्यक्ति (पक्षकार) की कमी के कारण भी अपराधी लोक सेवक कानूनी सजा से बच जाता है, क्योंकि व्यथित व्यक्ति स्वयं भी चाहे तो मुकदमा दायर कर सकता है, लेकिन अपनी नौकरी को खतरा होने की सम्भावना के चलते वह ऐसा नहीं करता है। लेकिन यदि विभागाध्यक्ष द्वारा मुकदमा दायर करवाया जाये तो विभागाध्यक्ष की नौकरी को तो किसी प्रकार का खतरा नहीं हो सकता, लेकिन विभागाध्यक्ष द्वारा पुलिस में प्रकरण दर्ज नहीं करवाया जाता है। जिसकी भी वजह होती है-स्वयं विभागाध्यक्ष भी तो आये दिन इस प्रकार के अपराध कारित करते हुए ही अपने विभाग में अपने अधिनस्थों पर आतंक को कायम रख पाते हैं। जिसके चलते मनमानी व्यवस्था संचालित होती है, जो कानूनों के विरद्ध कार्य करवाकर भ्रष्टाचार को अंजाम देने के लिये जरूरी होता है।

विभागीय जाँच के नाम पर सुरक्षा कवच :
किसी भी सरकारी विभाग में किसी महिलाकर्मी के साथ छेडछाड या यौन-उत्पीडन करने, सरकारी धन का दुरुपयोग करने, भ्रष्टाचार करने, रिश्वत मांगने आदि मामलों में भी इसी प्रकार की अनुशासनिक कार्यवाही होती है, जबकि इसी प्रकार के अपराध आम व्यक्ति द्वारा किये जाने पर, उन्हें जेल की हवा खानी पडती है। ऐसे में यह साफ तौर पर प्रमाणित हो जाता है कि जनता की सेवा करने के लिये, जनता के धन से, जनता के नौकर के रूप में नियुक्ति सरकारी अधिकारी या कर्मचारी, नौकरी लगते ही जनता और कानून से उच्च हो जाते हैं। उन्हें आम जनता की तरह सजा नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें विभागीय जाँच के नाम पर सुरक्षा कवच उपलब्ध करवाया दिया जाता है।

विभागीय जाँच का असली मकसद अपराधी को बचाना :
जबकि विधि के इतिहास में जाकर गहराई से और निष्पक्षतापूर्वक देखा जाये तो प्रारम्भ में विभागीय जाँच की अवधारणा केवल उन मामलों के लिये स्वीकार की गयी थी, जिनमें कार्यालयीन (ओफिसियल) कार्य को अंजाम देने के दौरान लापरवाही करने, बार-बार गलतियाँ करने और कार्य को समय पर निष्पादित नहीं करने जैसे दुराचरण के जिम्मेदार लोक सेवकों को छोटी-मोटी शास्ती देकर सुधारा जा सके, लेकिन कालान्तर में लोक सेवकों के सभी प्रकार के कुकृत्यों को केवल दुराचरण मानकर विभागीय जाँच का नाटकर करके, उन्हें बचाने की व्यवस्था लागू कर दी गयी। जिसकी ओट में सजा देने का केवल नाटक भर किया जाता है, विभागीय जाँच का असली मकसद अपराधी को बचाना होता है।
खजाने को नुकसान पहुँचाने वाला देशद्रोही से कम नहीं :
इस बात को कोई साधारण पढालिखा या साधारण सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी समझता है कि देश के खजाने को नुकसान पहुँचाने वाला व्यक्ति देशद्रोही से कम अपराधी नहीं हो सकता और उसके विरुद्ध कानून में किसी भी प्रकार के रहम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिये, लेकिन जिन्दगीभर भ्रष्टाचार के जरिये करोडों का धन अर्जित करने वालों को सेवानिवृत्ति के बाद यदि 1/2 पेंशन रोक कर सजा देना ही न्याय है तो फिर इसे तो कोई भी सरकारी अफसर खुशी-खुशी स्वीकार कर लेगा।

उम्र कैद की सजा का अपराध करके भी अपराधी नहीं :

दिल्ली हाई कोर्ट के इस निर्णय से 42 लाख रुपये के गलत भुगतान का अपराधी सिद्ध होने पर भी गुलाटी न तो चुनाव लडने या मतदान करने से वंचित होगा और न हीं वह कानून के अनुसार अपराधी सिद्ध हो सका है। उसे केवल दुराचरण का दोषी ठहराया गया है। जबकि ऐसे भ्रष्ट व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के अनुसार आपराधिक न्यासभंग का मामला बनता है, जिसमें अपराध सिद्ध होने पर आजीवन कारावास तक की सजा का कडा प्रावधान किया गया है। फिर प्रश्न वही खडा हो जाता है कि इस कानून के तहत मुकदमा कौन दर्ज करे?
जब तक कानून की शब्दावली में-ऐसा किया जा सकता है! किया जाना चाहिये! आदि शब्द कायम हैं कोई कुछ नहीं कर सकता! जिस व्यक्ति ने 36 मामलों में गलत भुगतान करवाया और सरकारी खजाने को 42 लाख की क्षति कारित की, उसके पीछे उसका कोई पवित्र ध्येय तो रहा नहीं होगा, बल्कि 42 लाख में से हिस्सेदारी तय होने के बाद ही भुगतान किया गया होगा। जो सीधे तौर पर सरकारी धन, जो लोक सेवकों के पास जनता की अमानत होता है। उस अमान की खयानत करने का मामला बनता है, जिसकी सजा उक्त धारा 409 के तहत अपराधी को मिलनी ही चाहिये।
कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर आपराधिक मामले दर्ज करने के आदेश देने चाहिये :

मेरा तो स्पष्ट मामना है कि जैसे ही कोर्ट के समक्ष ऐसे प्रकरण आयें, कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर अपराधी के साथ-साथ सक्षम उच्च अधिकारी या विभागाध्यक्ष के विरुद्ध भी आपराधिक मामले दर्ज करने के आदेश देने चाहिये, जिससे ऐसे मामलों में स्वत: ही प्रारम्भिक स्तर पर ही पुलिस में मामले दर्ज होने शुरू हो जायें और अपराधी विभागीय जाँच की आड में सजा से बच कर नहीं निकल सकें। इसके लिये आमजन को आगे आना होगा और संसद को भी इस प्रकार का कानून बनाने के लिये बाध्य करना होगा। अन्यथा गुलाटी जैसे भ्रष्टाचारी जनता के धन को इसी तरह से लूटते रहेंगे और सरेआम बचकर इसी भांति निकलते भी रहेंगे।